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अंत्येष्टि – एक लघु उपन्यास

धन्यवाद!        सर्वप्रथम, मैं अपने जीवन की उन समस्त विषम परिस्थितियों को, विशेषतः विगत ढाई-तीन वर्षों के मृत्यु-तुल्य कष्ट प्रदान करने वाले घटनाक्रमों को धन्यवाद करता हूँ जिन्होंने भाग्यवश या दुर्भाग्यवश, जो भी कह लें, मुझे इतना समय प्रदान किया कि मैं कुछ क्षण ठहर कर अपने अतीत पर दृष्टिपात कर सकूँ। इस ठहराव, इस अवलोकन ने जीवन के प्रति मेरे दृष्टिकोणों को एक अलग ही आयाम दिया और मेरी भावनाओं को उद्वेलित और आंदोलित किया।        अगले चरण का धन्यवाद अवश्य ही मेरी योग्य पुत्री “आकांक्षा” को जाता है जिसके ज़िद, आत्मीय मनुहार, और दृढ़ विश्वास ने मुझे अपनी उन बाधित, असंतुलित किंतु बाहर आ सकने को बेचैन भावनाओं को लिपिबद्ध करने को प्रेरित किया।       किंतु, यक्षप्रश्न तो यह था कि यह सब तभी सम्भव हो पता जब मैं जीवित रहता। मेरी प्राणप्रिय धर्मपत्नी “शोभा” के अथक प्रयासों और कभी न झुकने वाले आत्मबल ने मुझे बार-बार यमराज के हाथों से ठीक उसी प्रकार मुक्त करवाया है जैसे सावित्री ने सत्यवान के प्राण वापस ...

ज़िंदगी

जिगर भी चाक और दामन भी तार तार कभी ख़ंजर कभी काँटों को कोसा हमने इबादत की जिस ख़ुदा की बेख़ुद होकर हौसला उसका भी डगमगाते देखा हमने। भर लेते परवाज़ आसमाँ को छूने को क्या करते जमीं ने दबोचे रखा हमको रश्क था जिन कोहकनों से उनको भी इक शाम थक कर लौटते देखा हमने। गुमाँ था ज़िंदगी को ख़ुद पर इस क़दर कि वो बर्बाद कर छोड़ेगी हमको, मगर कुछ ख़बर न थी बेचारे को कि उसको  लतीफ़े से बढ़कर कुछ ना समझा हमने। कभी अश्कों में डूबे रहे, कभी कहक़हों में ज़िंदगी तुझे क्या बतायें कैसे जिया हमने ख़्वाहिशों के जाने कितने ही क़हकशों को बस यूँ ही पैमानों में ढाल कर पिया हमने। रात-दर-रात स्याहतर ही होती रहीं घटायें सर्द-बेदर्द ज़िंदगी की, मगर  चराग़ उम्मीदों के रौशन करते रहे हम और हथेलियों को फ़ानूस बनाया हमने। माना कि मंज़िलें भी खोती रहीं और कारवाँ भी बिछड़ता रहा हमसे, मगर अब दोनों हमें ढूँढते फिरते हैं बेसब्र से  इस क़दर लहू में उबाल उठाया हमने।

वह रात

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                                                 Photo by Matthew Henry on Unsplash जाने कैसा दर्द था फैला, वह जाने कैसी पीड़ा थी, हृदय पे कोई बोझ था या, वह मेरे मन की क्रीड़ा थी, उड़-उड़ आता मीलों यह मन, कुछ पाने की आशा थी, थक-थक वापस आ छुपता, हृदय ही उसकी नीड़ा थी। फिर एक दिवस ऐसा आया, प्रेम भरा हरकारा आया, कितने स्वपनिल शब्दों की वह, मालाएँ गूंथ लिवा लाया, पाँव नही पड़ते धरती पर, वह पुष्पों की थी जैसे शय्या, गगन भरा रंगों से जी भर, जैसे इंद्रधनुष की भूलभूलैया। साँझ संभल न पाती थी जैसे, बस मंद मंद मुस्काती थी, मदिर-मदिर मदिरा भी कुछ, मद मोर हिया बहकाती थी, यादों की निर्मम बदली घिर-घिर, अंधकार फैलाती थी, रात भी जैसे क्रंदन कर-कर तिमिर-तिमिर गहराती थी।   भटके राह पथिक सा बैठा, मैं सुनसान गलियारे में, एक आक्रोश भरा था मन में, छुपा रहा अंधियारे में, प्रणय सुधा खो आया तो अब क्या रक्खा पछतावे में, एक प्रेम का दीपक पा जाऊँ, तो बदलूँ मैं उजियारे में। एक तरफ झरता था ...